February 7, 2026 12:53 pm

शंकराचार्य बनाम प्रशासन: मौनी अमावस्या स्नान विवाद ने खड़े किए सनातन सम्मान और संवाद पर सवाल

प्रयागराज।
भारतीय सनातन परंपरा में संत समाज केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि समाज की चेतना और संस्कृति के संरक्षक माने जाते हैं। शंकराचार्य पद को सनातन समाज में भगवान स्वरूप की मान्यता प्राप्त है और देश में चार पीठों के चार शंकराचार्य अपने-अपने मठों से परंपराओं का निर्वहन करते हैं।

लेकिन बीते कुछ दिनों से ज्योतिष पीठ, जोशीमठ (उत्तराखंड) के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रशासनिक तंत्र के बीच उत्पन्न गतिरोध ने एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है।

मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद संगम नोज तक पालकी में सवार होकर स्नान के लिए जाना चाहते थे, लेकिन उन्हें बीच रास्ते से ही वापस अपने शिविर लौटना पड़ा। इसके बाद से वह धरने पर बैठे हैं और लगातार अपनी नाराज़गी जाहिर कर रहे हैं।

शंकराचार्य का कहना है कि वह पिछले करीब 40 वर्षों से नियमित रूप से संगम स्नान करते आ रहे हैं और बीते तीन वर्षों से पालकी यात्रा भी उनकी धार्मिक परंपरा का हिस्सा रही है। ऐसे में इस वर्ष अचानक उत्पन्न की गई यह बाधा समझ से परे है।

इस मामले में प्रशासनिक स्तर पर भी स्पष्ट संवाद की कमी देखने को मिली है। अलग-अलग अधिकारियों के बयान विरोधाभासी रहे, जिससे स्थिति और उलझती चली गई। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पुलिस आयुक्त योगेंद्र कुमार से विशेष रूप से नाराज़ नजर आए।

वहीं पिछले वर्ष के महाकुंभ का एक दृश्य भी सामने आया है, जिसमें तत्कालीन मेला प्रशासन के प्रमुख विजय किरण आनंद स्वयं पालकी सहित शंकराचार्य की अगवानी करते हुए दिखाई दिए थे। यही कारण है कि इस बार के व्यवहार को लेकर संत समाज में असंतोष गहराता जा रहा है।

इस पूरे प्रकरण में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। संत समाज का मानना है कि सनातन परंपराओं के प्रति सजग रहने वाले मुख्यमंत्री को स्वयं आगे बढ़कर पहल करनी चाहिए थी। उधर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट कहा है कि जब तक मुख्यमंत्री स्वयं आकर उन्हें स्नान के लिए नहीं ले जाते, वह धरने से नहीं उठेंगे।

हालांकि शंकराचार्य का यह भी कहना है कि साधु-संत किसी भी राजनेता से व्यक्तिगत नाराज़गी नहीं रखते। इसका उदाहरण पूर्व में उस अवसर पर देखने को मिला, जब एक प्रतिष्ठित उद्योगपति परिवार के विवाह समारोह में शंकराचार्य ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आशीर्वाद दिया और अपने गले से रुद्राक्ष की माला उतारकर उन्हें पहनाई।

इस विवाद ने राजनीतिक हलकों में भी हलचल मचा दी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने फोन पर शंकराचार्य से बातचीत कर उन्हें ढांढस बंधाया। वहीं भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद मानवता और सम्मान के नाते वे इस मुद्दे पर संत समाज के साथ खड़े हैं।

प्रख्यात संत प्रेमानंद जी महाराज सहित कई संतों का कहना है कि गृहस्थ हो या संन्यासी, सनातन समाज शंकराचार्य को ईश्वर स्वरूप मानता है और उनके सम्मान से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

अब यह मामला केवल प्रशासन और संत के बीच का विवाद नहीं रह गया है।
यह प्रश्न बन गया है—
सनातन परंपरा के सम्मान, संवाद और संत समाज की मर्यादा का।

अब देखना यह होगा कि यह गतिरोध संवाद के माध्यम से सुलझता है या टकराव की दिशा में और आगे बढ़ता है।

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