March 12, 2026 1:49 pm

RSS : विचारमंथन की सतत यात्रा

नई दिल्ली/नागपुर:
2 अक्टूबर 1925… नागपुर की धरती पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने एक ऐसा कदम उठाया, जिसने आने वाले सौ वर्षों तक भारतीय राजनीति, संस्कृति और समाज की दिशा बदल दी। एक छोटे से कमरे में जिस संगठन का जन्म हुआ, वही आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के रूप में करोड़ों समर्थकों और लाखों स्वयंसेवकों के साथ एक विशाल परिवार बन चुका है।

संघ ने क्या पाया?

संघ ने सबसे पहले संगठन की ताकत को खड़ा किया। गाँव-गली से लेकर कस्बों और शहरों तक इसकी शाखाएँ और स्वयंसेवक मौजूद हैं।
राजनीतिक मंच तैयार किया—जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी (BJP) तक का सफर तय किया, और आज केंद्र तथा कई राज्यों में सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ चुका है।
सांस्कृतिक पहचान और हिंदू चेतना को मजबूत किया—रामलला से गोवर्धन तक धर्म और संस्कृति की धारा को जनमानस में प्रवाहित किया।
आपदा राहत, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण सेवा के क्षेत्र में भी संघ ने अपनी भूमिका निभाई।

लेकिन क्या खोया?

हर सफर के दो पहलू होते हैं।
संघ को आलोचना और विवादों का सामना भी करना पड़ा।
कट्टरता और धर्म-राजनीति के आरोपों की छाया में अक्सर इसे घिरा पाया गया।
आधुनिक युवा सोच और टेक्नोलॉजी के युग में परंपरा और प्रासंगिकता का टकराव झेलना पड़ा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी छवि को लेकर भी सवाल खड़े हुए।

100 साल का निष्कर्ष

संघ का यह शताब्दी सफर आसान नहीं था।
इसने शक्ति, पहचान, संगठन और सेवा पाई, लेकिन आलोचना, विवाद और छवि का बोझ भी उठाया।
इतिहास हमेशा यही कहता है कि सफलता और चुनौती, अनुशासन और आलोचना, परंपरा और आधुनिकता—ये सब साथ-साथ चलते हैं।

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