बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सरगर्मी के बीच, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार को सहरसा और दानापुर में चुनावी जनसभाओं को संबोधित किया।
इस दौरान उन्होंने कांग्रेस और आरजेडी पर तीखा हमला करते हुए कहा —
“कांग्रेस को विकास नहीं, बुर्का चाहिए!”
योगी ने अपने भाषण में एनडीए सरकार की उपलब्धियों को गिनाया और कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार ने तेज़ी से विकास की राह पकड़ी है।
योगी की गर्जना — “अब लालटेन युग खत्म, LED का दौर शुरू”

दानापुर की रैली में योगी आदित्यनाथ ने कहा —
“आज बिहार में विकास भी है और विरासत भी है।
एनडीए ने पूरे बिहार को अपना परिवार मानकर बिना भेदभाव के योजनाओं का लाभ दिया है।”
उन्होंने कहा कि राजद के शासनकाल में कहा जाता था —
“सड़क बनाओगे तो कच्ची शराब कैसे बनाओगे?”
योगी ने कहा कि एनडीए सरकार ने बिहार से ‘पहचान का संकट’ खत्म कर दिया है और अब कोई भी राज्य को पुराने लालटेन युग में नहीं ले जा पाएगा।
“अब तो बिहार LED की दूधिया रोशनी में आगे बढ़ चुका है।”

RJD और कांग्रेस पर निशाना
सहरसा में योगी आदित्यनाथ ने विपक्षी गठबंधन पर करारा प्रहार करते हुए कहा —
“कांग्रेस और आरजेडी विकास की राजनीति नहीं, तुष्टिकरण की राजनीति करती हैं।
जनता अब जाग चुकी है और विकास के साथ खड़ी है।”
योगी ने दावा किया कि एनडीए की सरकार ने हर गांव तक सड़क, बिजली और रोजगार की योजनाएं पहुंचाई हैं।
उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने “गरीब का घर, युवाओं को रोजगार और किसानों को सम्मान” दिया है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया
योगी के इस बयान पर आरजेडी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
पार्टी प्रवक्ता एजाज अहमद ने कहा —
“योगी आदित्यनाथ समाज को बांटने की कोशिश कर रहे हैं।
बिहार की जनता विकास के मुद्दे पर फैसला करेगी, न कि नफरत के भाषणों पर।”

राजनीतिक मायने
योगी आदित्यनाथ की इन सभाओं को बिहार चुनाव में एनडीए की रणनीतिक चाल माना जा रहा है।
दानापुर और सहरसा जैसे क्षेत्रों में बीजेपी अपने वोट बैंक को मज़बूत करने की कोशिश में है।
वहीं विपक्ष इस बयान को “ध्रुवीकरण की राजनीति” बता रहा है।
बिहार में अब चुनावी जंग “विकास बनाम बुर्का” की बहस में बदलती दिख रही है।
योगी आदित्यनाथ के बयानों से जहां एनडीए कार्यकर्ताओं में जोश है, वहीं विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाकर पलटवार शुरू कर दिया है।
बिहार की जनता अब तय करेगी — ‘विकास का रास्ता’ या ‘वोट बैंक की राजनीति’?











