गुरु पूर्णिमा पर्व
अरविंद श्रीवास्तव; गोरखपुर।
जिस संस्था का सवेरा जय गुरु की गूंज से हो, जहां लोग एक दूसरे का अभिवादन जय गुरु से करें, सदस्यों के मोबाइल टोन में जय गुरु गूंजे, आप समझ सकते हैं उस संस्था में गुरु का महत्व क्या होगा, शायद बताने की जरूरत ना हो। ऐसी संस्था की स्थापना 1917 से 1920 के बीच में YSS OF INDIA (मुख्यालय रांची) और Self Realization Felowship (अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय कैलिफोर्निया में), परम पूज्य परमहंस योगानंद गुरूजी द्वारा किया गया था। परमहंस योगानंद जी का जन्म और बाल्यकाल गोरखपुर जनपद में बीता ।

योगानंद जी की जन्मस्थली पर एक संग्रहालय का निर्माण होना है। ऐसी पवित्र स्थली को पा कर उनके शिष्य फूले नहीं समा रहे। इसी क्रम में गोरखपुर शहर में कोतवाली थाने के ठीक बगल में निर्मणधीन संग्रहालय परिसर में पंहुचे सदस्यों (devotees) ने आज गुरु पूर्णिमा के दिन संभवत पहली बार अपने ईष्ट को याद किया।

मुकुंद से योगी और परमहंस कहलाने तक की यात्रा
माता-पिता के दुलारे बालक मुकुंद जब योगी बने तो योगानंद कहलाए। वे उच्च शिक्षा के प्रति उदासीन थे लेकिन जब उनके गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरी जी ने अपनी इच्छा जताई कि तुम विदेश जाकर भारतीय संस्कृति और परंपरा का प्रचार प्रसार करो और इसके लिए तुम्हारा स्नातक होना जरूरी है, गुरु की बात माननी ही थी तो उन्होंने स्नातक किया।
1935 में विदेश से वापस लौटे योगानंद को देख निहाल हुए गुरु स्वामी युक्तेश्वर जी ने एक अनुष्ठान के बाद योगानंद को परमहंस की उपाधि दी। तभी से योगानंद परमहंस योगानंद के रूप में विश्व विख्यात हुए। गुरु शिष्य परंपरा के ध्वजवाहक परमहंस योगानंद, अपने गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरि जी के पसंदीदा शिष्यों में से एक थे।
गुरु शिष्य परंपरा की एक और बानगी यह है कि लाहिड़ी महाशय से दीक्षा ले चुके रेल अधिकारी भगवती चरण घोष और उनकी पत्नी ज्ञान प्रभा की जब गोद भरी तो बालक मुकुंद पैदा हुए, तो लाहिड़ी महाशय ने कहा कि आपका यह बालक उनके शिष्य युक्तेश्वर गिरी से दीक्षा लेगा, कालांतर में यही हुआ।


गुरु शिष्य परंपरा के ध्वजवाहक थे महावतार बाबा, लाहिड़ी महाशय, स्वामी युक्तेश्वर और परमहंस योगानंद
भारत अपनी संस्कृति और परंपरा के लिए ही जाना जाता है और जिसकी मजबूत कड़ी है गुरु शिष्य परंपरा। महावतार बाबा जी, लाहिड़ी महाशय, स्वामी युक्तेश्वर गिरि जी और परमहंस योगानंद; इस गुरु शिष्य परंपरा के ध्वजवाहक रहे। और इसीलिए रांची हो या कैलिफोर्निया हर जगह सबसे पहले और हर बार जय गुरु का घोष होता है।
पुष्पांजलि
निर्माणाधीन जन्मस्थली पर पुष्पांजलि अर्पित करने वालों में प्रो.आर सी श्रीवास्तव, अखिलेश श्रीवास्तव, डॉ एसपी राय, डॉ कुंवर, रमेश चंद्र श्रीवास्तव, अविनाश, देवेंद्र शुक्ला, डॉ सुभाष विश्वकर्मा समित दर्जनों डिवोटी मौजूद रहे।आप सभी को गुरु पूर्णिमा की शत-शत बधाई और नमन |







