July 30, 2026 12:14 am

सिर्फ 1500 रुपये से शुरू हुआ सफर, आज करोड़ों का सम्मान — ‘डिब्बे वाली दीदी’ संगीता पांडे की आत्मनिर्भर कहानी

गोरखपुर से अरविन्द श्रीवास्तव : कहते हैं हालात इंसान को तोड़ते नहीं, गढ़ते हैं। सीमित आय, महंगाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच एक महिला ने हार मानने के बजाय रास्ता बनाया। साइकिल पर घर की दहलीज़ से निकलीं संगीता पांडे ने मात्र 1500 रुपये से डिब्बा और प्रोडक्ट पैकेजिंग का काम शुरू किया। आज वही प्रयास कई महिलाओं के लिए रोज़गार का जरिया बन चुका है। उनके इस साहस और उद्यमिता को खुले मंच से सम्मानित करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें एक करोड़ रुपये का अनुदान भी दिया।

संगीता पांडे, जिन्हें लोग प्यार से ‘डिब्बे वाली दीदी’ कहते हैं, बताती हैं कि शुरुआत के समय सबसे बड़ा सवाल हिम्मत और डर के बीच का था। “डर था, लेकिन उससे बड़ा था हौसला,” वे कहती हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने छोटे स्तर से पैकेजिंग का काम शुरू किया और स्थानीय बाजार में भरोसा बनाया।

उनकी मेहनत को पहले परिवार ने सराहा, फिर समाज ने, और अंततः सरकार ने भी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक मंच से संगीता पांडे को सम्मानित किया और आर्थिक सहयोग देकर उनके काम को नई गति दी। इस सहयोग के बाद उनका कार्यक्षेत्र बढ़ा, मशीनें आईं, और कई अन्य महिलाओं को रोजगार मिला।

व्यावहारिक चुनौतियों पर बात करते हुए संगीता बताती हैं कि शुरुआत में सबसे बड़ी कठिनाई लोगों का भरोसा जीतना था। पूंजी सीमित थी, बाजार छोटा था, लेकिन गुणवत्ता और समय पर डिलीवरी ने उन्हें पहचान दिलाई।

आज संगीता पांडे उन महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं, जो घर की चौखट से बाहर कदम रखने में संकोच करती हैं। उनका संदेश साफ है — “बड़ी पूंजी नहीं, बड़ा हौसला चाहिए। शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन इरादे बड़े होने चाहिए।”

संगीता पांडे की कहानी सिर्फ एक महिला की सफलता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की जीवंत तस्वीर है — जहां सपनों को उड़ान देने के लिए साहस ही सबसे बड़ी पूंजी बनता है।

AXAR BHARAT संगीता पांडे के जज्बे को सलाम करता है और उन सभी महिलाओं को नमन करता है, जो अपने सपनों को सच करने का साहस रखती हैं।

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