“प्लास्टिक पर प्रतिबंध के दावों के बावजूद बाजारों में धड़ल्ले से बिक रहे मानकविहीन प्लास्टिक उत्पाद, माइक्रो और नैनो प्लास्टिक बन रहे स्वास्थ्य की नई चुनौती “
गोरखपुर |अरविन्द श्रीवास्तव |
करीब डेढ़ दशक पहले गोरखपुर समेत पूरे पूर्वांचल में प्लास्टिक पर प्रतिबंध को लेकर बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया था। जनप्रतिनिधियों और प्रशासन ने बाजारों में छापेमारी कर हजारों कुंतल प्रतिबंधित प्लास्टिक जब्त किए थे। उम्मीद थी कि आने वाले समय में प्लास्टिक का उपयोग काफी हद तक कम हो जाएगा, लेकिन आज भी हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां करती है। शहर से लेकर गांवों तक बाजारों में मानकविहीन प्लास्टिक की थैलियां, डिस्पोजल सामग्री और प्लास्टिक की बोतलें खुलेआम बिक रही हैं।

इसी बीच गोरखपुर विश्वविद्यालय के एक शोधार्थी ने माइक्रो प्लास्टिक को लेकर चौंकाने वाला दावा किया है। विश्वविद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग में प्रोफेसर विनय कुमार सिंह के निर्देशन में शोध कर रहे शिवम कुमार यादव के अनुसार, आज लगभग हर व्यक्ति अनजाने में हवा, पानी और भोजन के जरिए प्रतिदिन माइक्रो प्लास्टिक अपने शरीर में पहुंचा रहा है। चिंता की बात यह है कि इसके प्रभाव से नवजात शिशु भी अछूते नहीं हैं।

शोधार्थी के अनुसार, एक से पांच मिलीमीटर आकार के प्लास्टिक कणों को माइक्रो प्लास्टिक कहा जाता है, जबकि एक मिलीमीटर से भी छोटे कण नैनो प्लास्टिक कहलाते हैं। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि सामान्य आंखों से दिखाई भी नहीं देते, लेकिन शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंच सकते हैं। उनका कहना है कि वर्तमान समय में चाहे कोई शाकाहारी हो या मांसाहारी, माइक्रो और नैनो प्लास्टिक दोनों ही मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं। बोतलबंद पानी, प्लास्टिक के गिलास में चाय, डिस्पोजल कप, प्लास्टिक पैकिंग में खाद्य पदार्थ और यहां तक कि पैकेटबंद नमक भी माइक्रो प्लास्टिक के संभावित स्रोत माने जा रहे हैं।

शोधार्थी ने बताया कि दुनिया भर में इस विषय पर लगातार शोध चल रहे हैं। कई अध्ययनों में पौधों, समुद्री जीवों और अन्य खाद्य पदार्थों में भी माइक्रो प्लास्टिक की मौजूदगी दर्ज की गई है। वैज्ञानिक यह भी अध्ययन कर रहे हैं कि लंबे समय तक शरीर में इन कणों के जमा होने से कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि इन संभावित प्रभावों पर अभी व्यापक वैज्ञानिक अनुसंधान जारी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि 21वीं सदी में पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ माइक्रो प्लास्टिक भी सबसे बड़ी वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल होता जा रहा है। ऐसे में एकल-उपयोग (सिंगल यूज़) प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल, कपड़े या जूट के थैलों का प्रयोग और प्लास्टिक कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण समय की जरूरत बन गया है।
शोधार्थी के अनुसार, एक से पांच मिलीमीटर आकार के प्लास्टिक कणों को माइक्रो प्लास्टिक कहा जाता है, जबकि एक मिलीमीटर से भी छोटे कण नैनो प्लास्टिक कहलाते हैं। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि सामान्य आंखों से दिखाई भी नहीं देते, लेकिन शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंच सकते हैं।








